jain-phil

विडियो

Let's Get Started

Experience the Nasiyan Darshan

Photo Gallery

thumbnail thumbnail thumbnail thumbnail

View More

जैन धर्म

संसार की दुख दायक, काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह आदि दुष्प्रवृत्तियों के पूर्णतहः विजेता महापुरुषों को ''जिन'' कहा जाता है और इनके द्वारा प्रतिपादित धर्म ही जैन धर्म है. यह वर्तमान विश्व में प्रचलित सभी धर्मों में प्राचीनतम है. संसार के सभी प्राणी आत्मस्वरूप को प्राप्त हों, सुखी हों, यही इसका लक्ष्य है.

जैन धर्म के अनुसार लोक में छः द्रव्य पाये जाते हैं: जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश और काल. इनके लक्षण एवं इनकी विशेषताएं जिनसे ये पहचाने जाते हैं, इस प्रकार हैं:-

जीवः जिसमें चेतना है, अर्थात् जो ज्ञान दर्शन युक्त है. इसे आत्मा भी कहते है. यह अमूर्तिक है.

पुद्गलः जिसमें स्पर्श, रस, गंध, वर्ण पाया जाता है. यह मूर्तिक है अर्थात् इन्द्रिय गोचर है.

धर्मः यह द्रव्यों के गमनागमन में सहकारी है. यह अमूर्तिक है.

अधर्मः यह द्रव्यों की स्थिति में सहकारी है. यह अमूर्तिक है.

आकाशः यह द्रव्यों को जगह देता है. यह अमूर्तिक है.

कालः यह द्रव्यों के परिणमन में सहकारी है. यह अमूर्तिक है.

अमूर्तिक उसे कहते हैं जो इन्द्रिय गोचर नहीं है. जीव और पुद्गल क्रियावान हैं, शेष द्रव्य निष्क्रिय हैं.

हैंकोई भी द्रव्य अपना स्वभाव कभी नहीं छोड़ता है. ये छहों द्रव्य अनादिनिधन हैं. जैन धर्म ईश्वर को जगत् का कर्ता स्वीकार नहीं करता है क्यों कि यह जगत् स्वभाव से अनादि और अनन्त है.

आत्मास्तित्व और मुक्ति

जैन धर्म में प्रत्येक आत्मा का स्वतंत्र अस्तित्व स्वीकार किया गया है. यह किसी परमात्मा का अंश नहीं है. आत्मा से कर्म का संयोग अनादि काल से है जिसके कारण यह ८४ लाख योनियों में चार गति रूप (देव, मनुष्य, तिर्यंच और नरक गति) अवस्थओं में एक जन्म से दूसरे जन्म में जाता हुआ संसार में भ्रमण करता है और सुखङ्कदुख का अनुभव करता है. अपनी भावना एवं क्रियाओं द्वारा यह आत्मा पुद्गल परमाणुओं (कर्म) को आकर्षित कर अपने आप से संबंधित कर लेता है वही कर्म आठ प्रकार से आत्मा को इस प्रकार फल देते हैं:-

ज्ञानावर्णीयः ज्ञान को आच्छादित करता है.

दर्शनावण् यः दर्शन (सामान्य अवलोकन) को आच्छादित करता है.

वेदनीयः आत्मा को सुख दुख देता है.

मोहनीयः आत्मा को भुलावे में रख कर वस्तु स्थिति का भान नहीं होने देता अथवा मोहित करता ह.

आयः आत्मा को निश्चित काल के लिये चार गति रूप शरीर ७ में रोके रखता है आयु कर्म का समाप्त होजाना ही उस जन्म में मृत्यु है.

नामः आत्मा के चारों गतियों में शरीर की रचना करता है.

गोत्रः संसार में ऊँचे नीचे कुल में उत्पन्न कराता है.

अंतरायः आत्मा की अनन्त शक्ति एवं कार्य सिट्ठि में बाधक होता है.

ये पुद्गल कर्म आत्मा को फल दे कर आत्मा से अलग हो जाते हैं परन्तु इनकी उपस्थिति में इनके वशीभूत आत्मा फिर नवीन कर्मों को बांधता रहता है और इस प्रकार संसार का चक्र चलता रहता है. जब आत्मा अपने स्वरूप को पहचान कर इन कर्मों को संयम, तप, ध्यान द्वारा वियुक्त करने का पु्रुषार्थ करता है तभी परमात्मा बन जाता है. इस प्रकार कर्म बंधन और संसार के चक्र से विमुक्त होना तथा अपना शुट्ठ स्वरूप प्राप्त करना ही मुक्ति अथवा मोक्ष है. वस्तुतः आत्मा स्वयं अपने कर्मों का कर्ता और उनके फल का भोक्ता है.

संसार की अवस्था को समझ कर आत्मा को कर्म बंधन से मुक्त करने रूप अवस्था में ही शास्वत सुख है ऐसा समझने रूप जो आत्मा की परिणति है वह ''सम्यग्दर्शन'' कहलाती है. उस अवस्था को प्राप्त करने के उपायों की जानकारी ''सम्यग्ज्ञान'' है तथा इन उपायों पर चलना ''सम्यक्चारित्र'' है. सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र को रत्नत्रय भी कहते हैं. इन तीनो की एकता ही मोक्ष का मार्ग हैतीर्थंकरों ने इसी सत्य को जाना और जीव मात्र के कल्याण के लिये इसका उपदेश दिया.

अनेकान्त

जैन धर्म में वस्तु तत्व को चिंतन करने वाली बहुदृष्टि समन्वित प्रणाली अनेकान्त कही गई है. इसके द्वारा किसी वस्तु को या उसके स्वरूप को अनेक पहलुओं से विचार किया ८ जाता है. एकांत दृष्टि नय प्रणली है जो अपने आप में अपूर्ण है. सर्वतोमुखी प्रमाण प्रणाली ही किसी पदार्थ के स्वरूप का सर्वांगीण पूर्ण निर्णय दे सकती है

अहिंसा

जैन धर्म में मानसिक, वाचनिक और शारीरिक क्रियाओं के नियंत्रण पर अधिक जोर दिया गया है. मन से किसी का अहित न सोचो, वचन से सदा हित, मित, प्रिय वचन बोलो और शरीर से किसी को भी कष्ट न दो यही आत्मा की समीचीन प्रवृत्ति अहिंसा हैअहिंसा का प्रमुख लक्ष्य है ''आत्मनः प्रतिकूलानि परेशां न समाचरेत्''. जैनो का नारा है ''जीओ और जीने दो''

सदाचार

प्राणियों की हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील और परिग्रह ये पंच पापमय दुष्प्रवृत्तियां ही उनके लिये दुख दायक हैं. जुआ खेलना, मद्यपान, मांस भक्षण, वेश्या गमन, परस्त्री गमन, चोरी करना, शिकार खेलना, ये सात व्यसन जीवन का सर्वतः पतन कराते हैं. उक्त पाप एवं व्यसन राष्ट्र, समाज व धर्म के पूर्णतया घातक हैं. इनको छोड़ने से ही मानवमात्र की सर्वांगीण उन्नति हो सकती है.

अपरिग्रह

परिग्रह संपूर्ण पापों की जड है. मानव इसके संग्रह के लिये सभी अनर्थकारी प्रवृत्तियों को अपनाता है. जैन धर्म में विलासिता और संचयीकरण को निन्द्य बता कर भोग्य पदार्थों की सीमा का गृहस्थों के लिये विधान है और साधु-जन सर्व परिग्रह त्याग कर निर्ग्रंथ स्वरूप धारण करते हुए आत्मस्थ हों यही उपदेश है. वर्तमान विश्व में सुख और शांति स्थापन करने के लिये यही एक प्रमुख उपाय है.

तीर्थंकर

कालचक्र के अनुसार प्रत्येक कल्प युग में केवल २४ तीर्थंकरों की उत्पत्ति होती है और उनका जन्म अयोध्या नगरी में होता है यह जैन परंपरा है. ये तीर्थंकर अपने माता पिता की अकेली संतान होते हैं. बाद में संसार से विरक्त हो कर अपनी व्रत, तप, त्याग और ध्यान शक्ति की साधना से पूर्ण ज्ञानी होकर सर्व प्राणियों को हितकारी धर्मोपदेश करते हैं. अन्य धर्मों की तरह जैन धर्म में अवतार प्रणाली नहीं है. यहां तो मानव ही अपनी आत्म शुट्ठि से महा मानव (तीर्थंकर) पद प्राप्त करता है.

वही आत्मा तीर्थंकर होती है जो जीव मात्र के कल्याण की कामना निरंतर करती हैसब जीव जन्म मरण के बंधन से मुक्त होकर सांसारिक अवस्था का अंत करें-यह भावना उनके रोम रोम से निकलती है.

तीर्थंकर की पर्याय में यह आत्मा समीचीन मार्ग को पहचान कर पहलें उस पर स्वयं चलती है और फिर शांति और सुख के अन्वेषकों को इस मार्ग का उपदेश करती है.

मंदिरों का निर्माण ऐसे ही तीर्थंकरों की आराधना के लिये किया जाता है जिससे हमें उनके समान बन कर अपनी आत्मा का कल्याण करने की प्रेरणा मिले.